💥 नया ज़माना।
चलन है ये नए जमाने का_ VR Ke Films _Vikrant Rajliwal _Gazal/Poetry
बढ़ा कर हाथ, हट जाना पीछे को, चलन हैं आज-कल ये नए जमाने का।
मुस्कुरा कर चरित्र उछालना यारो का, दौर हैं आज कल ये नये ज़माने का।।
जता कर यारी, दिखा के अपना-पन, असूल हैं देना दगा आज कल ये नए ज़माने का।
भरी हैं रग-रग में मक्कारी जिनके, शान हैं बदलना रंग
अपना, आज कल ये नये ज़माने का।।
तोड़ विशवास भाई का सगे स्वयं, बाट पुरखों की देना
जमीन ताक पर हर रिश्ता रख नाज़ुक, हक है आज कल ये नए ज़माने का।
कर विस्मरण सुगंध माटी वो गांव की, विस्मरण भाईचारे का अपना व्यवहार अनमोल,
हर सम्बन्ध है कठोर, आज कल ये नए जमाने का।।
उड़ गए पंछी लिए दाना पानी अपना अपना, छोड़ आशियाना वो अपना पुराना,
सत्य है कमज़ोर अत्यंत,आज कल ये नए जमाने का।
पंछी है ये भावनाए स्वार्थी, आशियाना जो नेकी से भरा,कर विस्मरण वो साथ अपनों का,
भृम है कायम आज कल ये नए ज़माने का।।
विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
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चलन है ये नए जमाने का_ VR Ke Films _Vikrant Rajliwal _Gazal/Poetry
Author/Poet: Vikrant Rajliwal
https://youtu.be/zOoAcvXK-jU
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