⚠️ WARNING – कमजोर दिल वाले न पढ़ें ⚠️
विकल्प 1 (Simple & Scary):
⚠️ चेतावनी: यह कहानी कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है।
इसे पढ़ते समय डर लगना स्वाभाविक है…
अगर डर से सामना नहीं कर सकते, यहीं रुक जाएँ।
**शीर्षक:
“रात 2:17… जब दीवारों ने सांस लेना शुरू किया”**
उस रात सब कुछ सामान्य था…
या यूँ कहें, बहुत ज़्यादा सामान्य, जो अक्सर किसी भयानक शुरुआत का संकेत होता है।
घड़ी में ठीक 2:17 AM बज रहे थे।
कमरे की लाइट बंद थी, लेकिन दीवारें…
दीवारें अजीब तरह से ज़िंदा लग रही थीं।
मैंने करवट बदली।
तभी लगा—
👉 किसी ने मेरा नाम फुसफुसाकर लिया।
“विक्रा…न्त…”
मेरी सांस रुक गई।
कमरे में मेरे सिवा कोई नहीं था।
फिर भी… आवाज़ साफ़ थी।
बहुत पास से आई थी।
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अलमारी के पीछे की परछाईं
मैंने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की।
रोशनी जैसे ही अलमारी पर पड़ी—
😱 पीछे एक परछाईं हिली।
परछाईं नहीं…
वो तो किसी औरत की आकृति थी,
जिसकी गर्दन अस्वाभाविक रूप से टेढ़ी थी,
और आँखें…
पूरी तरह काली।
उसने धीरे-धीरे सिर उठाया
और बोली—
> “तू मुझे देख सकता है…
बाकी सबने मुझे नज़रअंदाज़ किया था…”
उसकी आवाज़ में दर्द नहीं,
नफरत थी।
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दीवार से टपकता अतीत
अचानक कमरे की दीवार से
लाल-सा तरल टपकने लगा।
खून नहीं था…
लेकिन उससे भी ज़्यादा डरावना।
उस तरल में
चेहरे बन रहे थे—
रोते हुए चेहरे…
चिल्लाते हुए चेहरे…
और एक चेहरा
मेरा अपना।
मैं पीछे हटा,
लेकिन फर्श ठंडा नहीं था…
वो धड़क रहा था,
जैसे किसी ज़िंदा शरीर पर खड़ा हूँ।
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आईना जो सच दिखाता है
मैं भागकर बाथरूम में घुसा।
आईने में देखा—
😨 मेरी परछाईं मेरे साथ नहीं हिल रही थी।
वो मुस्कुरा रही थी।
धीरे-धीरे।
और फिर उसने कहा—
> “अब तू जाग नहीं सकता…
क्योंकि तू कभी सोया ही नहीं था।”
तभी आईने से
एक हाथ बाहर निकला—
सड़ा हुआ, ठंडा,
और सीधा मेरी गर्दन पर।
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सुबह… या कुछ और?
अचानक आँख खुली।
सुबह हो चुकी थी।
सब सामान्य था।
लेकिन…
मेरी गर्दन पर
नीले निशान थे।
और दीवार पर
नाखूनों से लिखा था—
> “आज देखा…
कल साथ ले जाऊँगी।”
घड़ी देखी।
समय था—
🕒 2:17 AM
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अंत नहीं… शुरुआत
अगर आप ये ब्लॉग
रात में पढ़ रहे हैं…
तो एक बार
पीछे ज़रूर देखिए।
क्योंकि
कुछ कहानियाँ
पढ़ी नहीं जातीं…
वो आपको पढ़ती हैं। 👁️🗨️
विक्रांत राजलीवाल
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